मेरी अपनी ज़िंदगी मुझसे।

prayas gupta poem in hindi

कुछ अनजान सी है,
मेरी अपनी ज़िंदगी मुझसे,
कुछ परेशान सी है,
मेरी अपनी ज़िंदगी मुझसे।
कहीं गुम सी हो गई है,
वो सुकून वाली हंसी,
कुछ हैरान सी है,
मेरी अपनी ज़िंदगी मुझसे।

बीत गए हैं बरसों लम्हें,
जब मैं खुलकर हंस लेता था,
सहज ही कह देता सबकुछ,
मन हल्का कर लेता था,
मस्त मगन मदमस्तता थी,
ज़िंदगी  खुद मे पूरी थी,
अब तो कुछ गुमनाम सी है,
मेरी अपनी ज़िंदगी मुझसे।

मैं क्या कहूँ, क्या बता दूं, तुमसे,
क्या सहूं क्या जता दूं तुमसे,
दुःख ही तो जीवन का रस है,
अपनी परछाई को कैसे हटा दूं खुदसे,
हर दुःख में भी हंस लेता हूँ,
इसलिए कुछ हैरान सी है,
मेरी अपनी ज़िंदगी मुझसे।

-प्रयास गुप्ता।


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