कुछ बातें – प्रयास गुप्ता

प्रस्तुत कहानी “छुट्टियां” मेरी मानसिक गहराई से निकली एक फिक्शन स्टोरी है। मेरी भावनाओं को, मेरी यातनाओं को, मैने कुछ अल्प अनुभवों से भिगोकर कल्पना क्षेत्र में बरसाने का यत्न किया है। कुछ एक पंक्तियां अथवा दृश्य वास्तविक भी हों सकते है किंतु अन्यत्र संपूर्ण कथा में कल्पनातत्व विद्यमान है। वस्तुतः मै इतना परिमार्जित नहीं हूं कि अपने विचारों को कल्पना के संसार में पूरी तरह संजोकर दृश्य विधान कर सकूं परंतु मेरे अंतर्मन की उपज ने कर्म करने का आदेश दिया और मैने अपना कार्य निष्ठापूर्वक पूर्ण किया। अब इसका फल मुझे तब प्राप्त होगा जब इस कहानी को पाठको का स्नेह प्राप्त होगा।

        मेरा साहित्य उतना परिष्कृत नही है। अतः मेरे साहित्य सृजन हेतु मुझे प्रोत्साहन देने वाले मेरे प्रशिक्षक गण, मित्र और पाठकजनो को मै धन्यवाद करता हूं और इस कहानी में हुई समस्त भूलो एवं गलतियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूं ।

            प्रयास गुप्ता।

छुट्टियां

चार पहर बाद संध्या के आने के पूर्व के समय में, मै खुले स्वछंद और निर्मल आसमान को अक्सर देखा करता था। खुले आसमान को निहारना मेरा शौक था या मर्ज, ये तो मैं नहीं जानता लेकिन हां ! मै बहुत अधिक समय तक नही देखता था क्योंकि इस स्वच्छंद, निर्मल और नीलीमा से युक्त आसमान को देखकर मेरी आंखो के सामने अतीत के धुंधले से चित्र घूमने लगते थे। अक्सर मैं अपने अतीत से जल्दी ही उभर कर आगामी जीवन की शांति के लिए यत्न करने में लगा रहता हूं लेकिन जब कभी आसमान को देख लो, उसकी नीलिमा में खो जाऊं तो फिर रोकना मुश्किल हो जाता है मेरी स्मृतियों को। वे स्मृतियां जो कभी सुख और दुःख की महीन रेखाओं से जीवन के सौंदर्य का चित्र बनाती थी परंतु वह चित्र हमेशा धुंधला ही बनता था। कभी स्पष्टता उसमें ना आ पायी, शायद इसलिए वे स्मृतियां अतीत की कुछ घटनाओं के रूप में संचित है ना पूर्णतः बिसर पायी है और ना ही पूर्णतः जीवन में उपस्थित हो पायी है।

आज जो याद आया वो बिसरने योग्य नही है लेकिन मैं धुंधला  देना चाहता हूं उन्हें, उसकी स्मृतियों को, उसकी बातों को। कुछ एक साल हुआ था, नित्या का मेरे जीवन में प्रवेश हुआ था। हम इंदौर के भवर कुंआ इलाके में अधिकतर चाय टपरी पर मिला करते थे। वो आती थी हमेशा अपने हाथ में सिल्वर रंग की घड़ी और माथे पर छोटी सी बिंदी उसके गौर वर्ण पर हल्की सी गुलाबी रंग की मुस्कान उसे और अधिक प्यारी बनाती थी। “प्यारी !!” अक्सर यही विशेषण कहा करता था मै उससे,

“सुनो ! नित्या

हां !! – उसके हां में शालीनता और मासूमियत की झलक मन में उसके लिए प्रेम से ज्यादा आदर उत्पन्न करती थी।

” बहुत प्यारी लग रही हो ” मैने कहा।

“अरे यार अशोक, तुम्हारी तो आदत सी पड़ गई है,, जब देखो एक ही लाइन में हफ्ते भर की तारीफ कर देते हो।”  – एक छोटी सी मुस्कुराहट  और नटखटपन के साथ कहते हुए कुछ सेकण्ड के लिए देखती रही।

” मै शांत था “

” अब कुछ बोलोगे या मै जाऊं ? “- फिर चिढ़ते हुए दूसरी ओर मुड़ने को हुई।

मैंने हाथ पकड़ा और कहा –

” तुम सच में बहुत प्यारी लग रही हो !!”   और मुस्कुरा दिया।

वो बड़ी नज़ाकत से बोली – ” अच्छा ठीक है, अब चाय पी लीजिए मिस्टर। ” 

“हां, हां, चलो चलते है । ”  मैने कहा।

मेरा दिन निकलने से लेकर गुजरने तक एक बार तो उसकी तारीफ करना ही पड़ता था, यदि नहीं करो तो ना मुझे चैन मिलता था ना उसे सुख। एक बार जानबूझ कर मैने उसकी तारीफ नहीं की तो पूरे दिन भर झगड़ा किया था, नित्या ने।  हालांकि उसका गुस्सा और झगड़ा तो झूठा था लेकिन मेरी तारीफ नहीं। उस दिन बड़े नटखटपन से खिलखिलाती हुई आयी और अचानक से कहने लगी कि बताओ अशोक आज कुछ अलग नजर आ रही हूं मैं ??

मैने कहा – ” हां !! आज थोड़ा मेकअप ज्यादा हो गया है। और हस दिया।”

नित्या कहती है – ” ये नही पूछ रही स्टूपिड, कुछ बदला सा लग रहा या नहीं और बताओ।”

मैने चिढ़ाने के लिए कहा कि ” हां, आज थोड़ी कम ठिगनी दिख रही हो!!जरा बताओ ये एक दिन में हाइट कैसे बढ़ाई तुमने ?? “
“चुप रहो तुम!! – कुछ भी दिखाई नही देता तुम्हे “

जब चिढ़ने की सीमा हो चुकी और उसके गाल गुब्बारों की शोभा को हरने लगे तो मैने कहा –

” बहुत प्यारी लग रही हो, नए इयररिंग्स में। “

नित्या अचानक से मुस्कुरा उठी और कहने लगी जब पहले ही नोटिस कर लिया था तो इतनी देर से चिढ़ा क्यों रहे थे। मैने कहा – ” तुम भी तो हमेशा डांटती रहती हो !!”

फिर कहती है, ” मैं डांटती नही, चिंता करती हूं समझे!! मै चिंता ना करू तो खाने के लिए सब्जी लेने का भी याद ना रहे तुम्हे, फिर भूखे ही रहना। ” 

मैने कहा – ” जी मैडम, मै हारा आप जीती !!”

अब चले ?

” हां, हां चलती हूं । ज्यादा नाटक करने की जरूरत नहीं है। बहुत चालाक हो तुम अशोक !! “

“लो जी, अब मैंने क्या किया ? – मैंने मुस्कुराहकार कहा।

” नहीं आप कुछ करते ही कहां है, चिढ़ा तो मैं रही थी ना “

फिर नया झगड़ा शुरू। खैर, उसके साथ रोज मिलना, घण्टों बातें करना और झगड़ा करना दिनचर्या हो गई थी। एक दिन भी बगैर उसके, निकलना मुश्किल सा लगता था और अब,,,,,,,,,,,अब तो,,,,,,!!

कुछ ही महीने बाद हम दोनो की दोस्ती में शीरे की सी मिठास घुल गई थी लेकिन ये भी सत्य है जहां मिठास होती है वहां मक्खियां भी लगती ही है। दरअसल मैं इंदौर में लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी में था और नित्या एसएससी की।
हालांकि उसके पिछले अटेम्प्ट क्लियर नहीं हो सके और परिवार की ओर से ये अंतिम मौका था। उसके परिवार में माता-पिता और छोटी बहन थी। पिता सरकारी शिक्षक और मां ग्रहस्वामिनी थी और थोड़ी कम पढ़ी लिखी भी। शिक्षित होने के बावजूद भी एक रूढ़ि विचार मां के अंतर्मन में कहीं न कहीं चोट करता ही रहता था जो उनके मायके की देन था इसलिए अपने पिता की लाडली बेटी को रिश्तेदारों के दबाव और मानसिक रूढ़िवादिता के कारण  घर गृहस्थी के काम में निपुण कर देना चाहती थी जिससे उनकी नाक बची रहे। वे पढ़ी लिखी थी लेकिन जिंदगी, सपने, मंजिल से दूर केवल किताबी पढ़ाई जो एक गांव में करवा दी जाती है।

हम अक्सर छुट्टियों में घर जाते थे और घर पर बात बंद रहती थी। हमेशा की तरह नित्या जाने के एक दिन पहले मिल कर चली गई और मैं भी। उस दिन कुछ ज्यादा बात ना हो सकी।

कुछ तीन माह बीत चुके थे। ना मै अपने घर से निकला था, ना नित्या। ना उसका कोई कॉल, ना मैसेज और ना मेल। वो कुछ ऐसी हो गई थी कि जैसे वो मुझे जानती ही ना हो। और मेरी स्तिथि ,,,,,?
   मेरी स्तिथि कुछ ऐसी थी कि जीवन की सारी विकट परीक्षाएं एक साथ सामने थी। जिनका सिलेबस मै पहली बार देख रहा था। डिप्रेशन, एंजाइटी और टेंशन में जीने की आदत सी पड़ गई थी। जिन परिस्थितियों को सुधारने के लिए मै मेहनत कर रहा था, आज वे साक्षात सामने थी तो डर लग रहा था, मैं भागना चाहता था, मै सिर्फ सोता रहता था, मै बस अकेला था और अकेला। 

इन तीन महीनों में मुझे जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत महसूस हुई, वो है एक श्रोता की। जो मेरी कथा सुने और मैं अपने वक्तव्य से अपनी सारी भड़ास निकाल सकूं। अक्सर नित्या की बातों को सुनते वक्त मैं उसका प्रखर श्रोता हुआ करता था और वो मुझे बोलने का मौका ही नही देती थी लेकिन जब आज मेरी बारी थी तब वो थी ही नहीं।
जब आप किसी को कुछ निर्मल भाव से देते हो तो वक्त आपकी परीक्षा अवश्य लेता है और यही स्तिथि आपकी आशा के रूप में प्रतिक्रिया हेतु बाध्य करती है।
जब नित्या को आवश्यकता थी मै हमेशा उसके लिए उपस्तिथ था आज एक बार मुझे जरूर पड़ी तो वक्त को स्वीकार न हुआ, एक दोस्त का साथ भी वक्त ने नामंजूर किया और यही जीवन की वास्तविक सच्चाई है।
जब परीक्षाएं वक्त की होती है तो सारे नियम, कानून, सिलेबस और समय वक्त सुनिश्चित करता है और अपने अनुसार परीक्षा लेता है।

कुछ और माह बीत चुके थे चारो तरफ का माहौल भयावह था, वैश्विक महामारी से सुपर पावर जैसे देश भी हार स्वीकारने को मजबूर थे। हमारा देश विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और एक ही पार्टी के प्रशासन का दूसरा दौर चल रहा है। अब तक  किसी भी देश ने वैक्सीन नही बनाई थी लेकिन सभी देश बढ़ चढ़कर वैक्सीन बनाने को आतुर थे। इस स्तिथि में सभी अपने घरों में कैद थे और हर कैद पक्षी हवाओ में स्वछंद और आजाद विचरण कर रहे थे।

ये मानवीय प्रवृत्ति ही तो है, हम स्वछंद विचरण करना चाहते है और हमारे मार्ग में आने वाले हर रोड़े को कैद कर लेना। आज प्रकृति स्वछंद पुलकित हो-होकर स्वतंत्रता से विचरण कर रही है और हम कैद है, यह मानवीय अतिवादिता का ही फल है।

आज अचानक मेरा फोन बजा, किसी अनजान नंबर से, कॉल आ रहा था, मै ना जाने कुछ सोच में पड़ा हुआ फोन न. पर नजर गड़ाये बैठा, मैंने फोन उठाया-

हेलो !!

सब शांत था ।

हेलो!!

उधर से नित्या के रोने की आवाज आ “अशोक !!”

मैंने कहा ” क्या हुआ नित्या, तुम रो क्यों रही हो, कहां थी अब तक, ना कोई कॉल, न मैसेज, कैसी हो? सब ठीक तो है ना??

मेरे इतने अधिक सवालों के उत्तर में नित्या सिर्फ रो रही थी। मैने कहा –  ” नित्या तुम रोओ मत, चुप हो जाओ हुआ क्या है ये तो बताओ??”

“पापा!!”  सिर्फ इतना कहा और फिर रोने लगी।

मैंने कहा ” क्या हुआ पापा को ?? “

” पापा कोविड पॉजिटिव है और उन्हें एडमिट किया गया है, मुझे बहुत डर लग रहा है अशोक ,,,,,,” – रोते हुए उसने कहा।

मैंने उसे समझाते हुए कहा- “तुमको घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है तुम समझदार हो, हौसला रखो, सब ठीक हो जायेगा, रोना छोड़ो और अपना और पापा का ध्यान रखो, हिम्मत कैसे हार गई तुम ??”

मै बोलता गया, नित्या केवल सिसकियां ले रही थी। 

मैंने फिर कहा रोना बंद करो, कुछ बोलो नित्या!! प्लीज, घबराओ नहीं सब ठीक हो जायेगा।

” हां अशोक, ठीक है मुझे जाना है । बाय !!”

अचानक उसने फोन रख दिया।

मै कुछ समय तक फोन की ओर ही देखता रहा कि ये अचानक से क्या हो गया। अचानक से इतने दिनो बाद नित्या का फोन आना और उसका इतना घबराए हुए बात करना मुझे परेशानी में डाल गया था और मैं उस बात को सोच सोचकर परेशान हो रहा था।

मुझे अचानक याद आया मेरे घर के बाजू में एक भैया रहते थे उन्होंने एक बार एक न्यूज पेपर में छपी स्कॉलरशिप के विज्ञापन के बारे में बुला कर बताया था मैने न्यूज पेपर के रद्दी हो जाने तक स्कॉलरशिप के लिए मैसेज किए, स्कॉलरशिप तो नही मिली लेकिन भैया से दोस्ती बहुत बढ़िया हो गई। वे अक्सर कहा करते थे –  ” अशोक तुम्हारा टैलेंट किसी को बोल के नहीं करके दिखाना “

वे अक्सर चेस खेलते और इंजीनियरिंग की पढ़ाई में घुसे रहते थे मुझे अक्सर कहा करते थे, तू बस अपनी पढ़ाई कर बाकी सब अपने आप हो जायेगा। कुछ ही समय हुआ उनकी इंदौर में जॉब लगी और फिर वो शादी करके सैटल भी हो गए, शादी को कुछ आठ महीने हुए होंगे,,,,

अचानक एक दिन खबर आयी भैया नहीं रहे,,, मै अचंभित निस्तब्ध सुन्न सा हो गया था। भैया बड़े संघर्षों के साथ इस उपलब्धि तक पहुंचे लेकिन ईश्वर को मंजूर ना रहा कि वे और आगे जाएं। बाद में पता चला कि वे कोविड पॉजिटिव थे उनकी पत्नी को देखा तो वे बिलख बिलख कर रो रही थी उन बेचारी की तो जिंदगी अब शुरू ही हुई थी,,

” तुमने हमेशा साथ निभाने की कसम खाई थी तुम ऐसे नहीं छोड़ सकते मुझे” कुछ ऐसी बाते वे अपने आप करते रहती थी।

ऐसी भयावह स्तिथि को लेकर मै अशांत था, बहुत चिंतित और अस्थिर। मै नित्या के बारे में अक्सर सोचता, मानसिक उथल-पुथल  में उसकी याद मेरे मस्तिष्क और अंतर्मन में भवंडर उत्पन्न कर देती थी।
मेरे मस्तिष्क के असीम जल प्रलय में मैं बिना चप्पू की डोंगी में अनेक ज्वार-भाटों के बीच अपनी स्तिथि अत्यंत निस्सहाय, दयनीय पाता हूं और अचानक ,,,,,

” बचाओ , बचाओ
मै डूब रहा हूं ,
मेरी नाव में पानी भर आया है। “

कुछ ध्वनियां पीछे से सुनाई आती है मै अत्यंत विचलित रूप से अनेक हाथ पैर मारने के बाद निंद्रा में चला गया ,,,, एक गहरी निंद्रा।

मैने बहुत बार प्रयत्न किया नित्या को कॉल करने का, मैसेज का लेकिन कोई फल ना मिला, एक दो बार हां हेलो !! के बाद फोन काट दिया गया। एक दिन उसने फोन उठाया,,

मैने कहा हेलो नित्या !!

हां बोलो – इस बार अंदाज कुछ अलग था।

मैने कहा – कैसी हो,, क्या हुआ  कैसे बोल रही हो तुम ,,,,,,??

” मै ठीक हूं और अच्छे से ही बोल रही हूं । ” –इस बात में उतना ही उजड़ापन था जितना मुझे मेरे जीवन से था जब वो मुझसे दूर थी।
फिर वो अचानक कहती है –  ” सुनो अशोक अब जब तक मैं कॉल या मैसेज ना करूं तुम्हे कोई जरूरत नहीं है करने की ,,,,,, ठीक है ??”

उसकी बातों में अचानक इतनी तीक्ष्णता मैने सोचा भी नही था।  तभी अचानक फोन कट गया और फिर ना फोन आया, ना लगाया गया।

आज जो स्मृतियां मुझे आसमान को देखकर याद आयी है उन्हे मै धुंधला देना चाहता हूं । क्यों?? क्योंकि आज नित्या का जन्मदिन है और मेरे पास कोई साधन नहीं है कि उससे बात करू केवल उसकी यादों के अलावा,,,,,,,,,,,, उसकी बातो को याद कर उनसे बाते करने से मै डरता हूं,,, कहीं वे यादें भी मेरा तिरस्कार ना कर दे ,,, जैसे नित्या ने,,,,,,,,!!!

इस महामारी ने सबकी समस्याओं को व्यक्तिगत बना दिया है, अब कोई किसी की सहायता करना चाहे तो भी सोचने लगता है, पहले अपने बारे में । हम स्वकेंद्रित हो अच्छी बात है लेकिन हम में केवल स्वहित की भावना ना हो। इस महामारी ने सबसे पुरातन संस्कृति से अवगत कराया है साथ ही अपनो में छुपे अपने और पराए को भी पृथक किया है।

आज सबकी समस्याएं अपनी है, कोई किसी की सहायता करता भी है तो पहले व्यक्तिगत हानि का विचार करता है और फिर परहित का सोचता है हालांकि यह पूर्णतः सत्य नही है। बहुत सी ऐसी संस्था, दल और व्यक्ति केवल परहित के लिए कार्य कर रहे है और यह हमारे उच्च मानवीय मूल्य है जो नैसर्गिक रूप से संस्कृति प्रदत्त है और यही हमारी संस्कृति और सभ्यता की विशेषता है जो इस देश के हर एक व्यक्ति में कहीं न कहीं विद्यमान है, बस आवश्यकता है तो उसके भावावेश के उत्थान की, फिर संभवतः हर कोई तन से, मन से, या धन से अथवा किसी न किसी रूप से सहायता अवश्य करेगा।

मेरी समस्याएं अपनी है, मै किसी की प्रत्यक्षतः सहायता नहीं लेता लेकिन नित्या तो मुझे सब कुछ बताती थी फिर उसने इस बार क्यों नही बताया, वो हमेशा मुझे चुप कराकर स्वयं बोलती रहती थी, इस बार मेरे इतने बोलने पर भी ना बोली,,,, क्यों ??
इस “क्यों “ का उत्तर आज तक मुझे नही मिला, मै उसके बिना अधूरा सा महसूस करता था और मेरे अधूरेपन में ,,,,शायद नित्या स्वयं को पूर्ण करना चाहती थी। वह सीखना चाहती थी सब कुछ- अकेले जीना, हारना-जीतना, गिरना-संभालना, और आगे बढ़ना ,,,,!!!

” या शायद सीखाना चाहती थी !!! “

– प्रयास गुप्ता।
बी. ए. द्वितीय वर्ष
07/05/2021

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