मैं तुम्हें देखता रहूँ – प्रयास गुप्ता

prayas gupta poetry-main tumhe dekhta rahun
prayas gupta poetry-main tumhe dekhta rahun

महकती शाम में,
तुम मेरे सामने
बैठी रहो,
और मैं तुम्हे देखता रहूं।
ऐसे जैसे चकोर देखता है,
चंद्रमा को।

तुम्हारे नजदीक मैं,
तुम्हारी सांसों को महसूस करूं,
ऐसे जैसे शरद की चांदनी रात में,
मंद हवा की सिहरन हो ।

तुम कहती रहो,
मै सुनता रहूं,
ऐसे जैसे एक अचल श्रोता,
अपने प्रिय कवि की कविता सुनता है ।

और जब तुम्हारा कोमल स्पर्श हो,
तो ऐसा हो, जैसे उस स्पर्श से,
मेरा लौह रज हृदय, स्वर्णमय हो जाए,
मै परखी बन जाऊ,
तुम पारस बनी रहो,

महकती शाम में,
तुम मेरे सामने,
बैठी रहो,
और मै तुम्हे देखता रहूं ।

-प्रयास गुप्ता।

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